Bihar Election 2025 : बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर पटना से दिल्ली तक सियासत गरमा गई है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने SIR को लेकर मोर्चा खोल दिया है और अब विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करने की धमकी दी है। तेजस्वी ने साफ कहा कि अगर यही हाल रहा तो चुनाव में हिस्सा लेने का कोई फायदा नहीं है।
तेजस्वी यादव ने कहा कि अगर चुनाव आयोग द्वारा SIR में पारदर्शिता नहीं बरती गई तो ‘महागठबंधन’ बिहार चुनाव का बहिष्कार करने पर विचार कर सकता है। तेजस्वी ने कहा कि हम चुनाव बहिष्कार पर अपने सहयोगियों से चर्चा करेंगे, क्योंकि जनता जानना चाहती है और दूसरी पार्टियाँ क्या चाहती हैं।
तेजस्वी ने कहा कि जब चुनाव ईमानदारी से नहीं हो रहे हैं, तो चुनाव क्यों कराए जा रहे हैं? बिहार में भाजपा को एक्सटेंशन दे दीजिए। उन्होंने कहा कि चुनाव में समझौता हो चुका है। ऐसे में चुनाव में हिस्सा लेने का क्या फायदा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर महागठबंधन में शामिल सभी दल चुनाव का बहिष्कार कर दें, तो क्या चुनाव नहीं होंगे?

तेजस्वी के बहिष्कार करने पर क्या होगा?
राजद नेता तेजस्वी यादव ने जिस तरह से चुनाव बहिष्कार की बात कही है, वह बिहार की राजनीति को एक नया मोड़ दे सकता है। तेजस्वी के इस ऐलान के बाद सबकी निगाहें महागठबंधन के फैसले पर टिकी हैं। जानकारों का कहना है कि भारत में चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और किसी भी दल या गठबंधन के बहिष्कार से चुनाव प्रक्रिया रुकना नामुमकिन है।
इस मामले में कानून विशेषज्ञ कहते हैं कि चुनाव कराने का काम चुनाव आयोग का है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनाव कराने, उसकी प्रक्रिया तय करने और उसे नियंत्रित करने का अधिकार दिया गया है। इसे कोई नहीं रोक सकता। चुनाव आयोग खुद तय करता है कि चुनाव निष्पक्ष हों। प्रतिस्पर्धात्मक हों, यानी जो भी चुनाव लड़ना चाहे, उसे समान अवसर मिले। किसी के साथ कोई पक्षपात न हो। सांसद पप्पू यादव ने भी कहा है कि अगर चुनाव आयोग तैयार नहीं होता है, तो चुनाव का बहिष्कार ही आखिरी विकल्प होगा।
तेजस्वी के बहिष्कार का कोई असर नहीं होगा
चुनाव समय पर कराना चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी है। ऐसे में अगर कोई राजनीतिक दल बहिष्कार का फैसला लेता है, तो इसका असर सिर्फ़ उस दल की राजनीतिक रणनीति पर पड़ता है, चुनाव प्रक्रिया पर नहीं। इसीलिए चाहे कोई भी दल इसमें हिस्सा ले या न ले। अगर सिर्फ़ सत्ताधारी दल यानी सरकार चलाने वाला दल ही चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारता है, या कोई निर्दलीय उम्मीदवार भी है, तो भी चुनाव कराना चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी है।
तेजस्वी यादव या महागठबंधन के चुनाव बहिष्कार का कोई असर नहीं पड़ेगा। हाँ, यह ज़रूर है कि अगर विपक्षी गठबंधन मिलकर बहिष्कार करता है, तो इससे जनता और मतदाताओं में भ्रम और अविश्वास की स्थिति पैदा हो सकती है, जिसका असर मतदान प्रतिशत पर पड़ सकता है। इसके अलावा, चुनाव प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं आएगी।
कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक होते रहे हैं चुनाव का बहिष्कार
बिहार में भले ही तेजस्वी यादव पहली बार चुनाव बहिष्कार कर रहे हों, लेकिन जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक चुनावों का बहिष्कार हो चुका है। सबसे दिलचस्प यह है कि चुनाव बहिष्कार का बीज किसी अलगाववादी दल ने नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की नींव रखने का दावा करने वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस ने ही बोया था। इस तरह, कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक, राजनीतिक दल चुनावों का बहिष्कार करते रहे हैं, लेकिन इसका चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ा।

