RIP Satyapal Malik:  बिहार और जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल और वरिष्ठ नेता सत्यपाल मलिक का दिल्ली में निधन हो गया। उन्होंने मंगलवार को 79 साल की उम्र में दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह लंबे समय से बीमार थे। जानकारी के अनुसार, उन्हें 11 मई को आरएमएल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह पेशाब और किडनी में इन्फेक्शन की समस्या पीड़ित थे।

उनके निधन की जानकारी उनके अपने ट्विटर हैंडल पर पोस्ट की गई है। इस पोस्ट में लिखा गया था कि ‘पूर्व राज्यपाल चौधरी सत्यपाल सिंह मलिक नहीं रहे।’ यह खबर आते ही राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। 2017 में उन्हें बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। इसके बाद, अगस्त 2018 में, उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया था।

पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसावदा गांव में 24 जुलाई 1946 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा यही से हुई। इसके बाद उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय से बीएससी किया और कानून में डिग्री ली। इसी दौरान वे छात्र राजनीति से जुड़े, फिर शिक्षा पूरी होने के बाद मुख्यधारा की राजनीति में आ गए।

 

 

जानें उनके राजनीतिक सफर के बारे में :

जम्मू-कश्मीर राजभवन की वेबसाइट के अनुसार, सत्यपाल मलिक ने 1965-66 में राम मनोहर लोहिया की समाजवाद की विचारधारा से प्रभावित होकर पहली बार राजनीति में प्रवेश किया। 1966-67 में, छात्र राजनीति में अपने जीवन के दौरान, उन्होंने मेरठ कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा और जीता। इसके बाद उनका कारवां मेरठ विश्वविद्यालय (अब चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय) के छात्रसंघ चुनावों तक पहुँचा और वे छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए।

सत्यपाल मलिक 1970 के बाद राजनीति की मुख्यधारा में आए। शुरुआत में वे चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) का हिस्सा बने। उन्होंने अपना पहला चुनाव भी इसी पार्टी से लड़ा। बागपत से भी जीते और विधानसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक नियुक्त किए गए। अगले साल यानी 1975 में, जब भारतीय क्रांति दल बाद में लोकदल का हिस्सा बन गया, तो सत्यपाल मलिक को लोकदल का अखिल भारतीय महासचिव नियुक्त किया गया। इसी पार्टी ने उन्हें 1980 में राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया।

1984 में राज्यसभा में रहते हुए, वे कांग्रेस में शामिल हो गए। बाद में 1986 में, उन्हें कांग्रेस की ओर से राज्यसभा का चुनाव लड़ाया गया। इसके साथ ही, कांग्रेस ने उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महासचिव नियुक्त किया।

हालाँकि, मलिक और कांग्रेस का यह साथ ज़्यादा समय तक नहीं चला और 1987 में जब कांग्रेस पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगा, तो सत्यपाल मलिक ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा देकर अपनी पार्टी जन मोर्चा बनाई। बाद में उन्होंने 1988 में इस पार्टी का जनता दल में विलय कर दिया। बाद में मलिक कांग्रेस के ख़िलाफ़ विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ जुड़ गए और देश भर में जनजागरण सभाओं में हिस्सा लिया और कांग्रेस के ख़िलाफ़ लंबी लड़ाई लड़ी।

बाद में केंद्र में जनता दल की सरकार बनने पर उन्हें पार्टी का सचिव और प्रवक्ता नियुक्त किया गया। 1989 में उन्होंने जनता दल के टिकट पर अलीगढ़ से चुनाव भी लड़ा और जीत हासिल की।

 

2004 में भाजपा में शामिल हुए:

साल 2004 में सत्यपाल मलिक भाजपा के टिकट पर बागपत लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा।लेकिन इस चुनाव में विजयी नहीं हुए। इसके बाद भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा का उपाध्यक्ष नियुक्त किया। फिर 2009 में, उन्हें भाजपा के अखिल भारतीय किसान मोर्चा का प्रमुख नियुक्त किया गया। मलिक की भाजपा में सबसे बड़ी नियुक्ति 2012 में हुई, जब उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। 2014 के लोकसभा चुनावों में, उन्होंने भाजपा की घोषणापत्र समिति में कृषि संबंधी उप-समिति की अध्यक्षता की।

2014 में, मलिक को एक बार फिर भाजपा में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्होंने किसानों को भाजपा के पक्ष में लाने के लिए कई रैलियाँ कीं। यही वह दौर था जब सत्यपाल मलिक भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में काम करते रहे।

30 सितंबर 2017 को उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया। इसके बाद उन्हें अगस्‍त 2018 में जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया। इसके एक साल बाद, 5 अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने में उनकी अहम भूमिका थी। उस समय उन्होंने केंद्र सरकार के निर्देश पर जम्मू-कश्मीर में कानून-व्यवस्था संभाली थी। 2019 में जब जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का फैसला हुआ, तो सत्यपाल मलिक को पहले गोवा का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। हालाँकि, अगस्त 2020 में उन्हें मेघालय का राज्यपाल बनाया गया।

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