बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने एक और बड़ी कार्रवाई की है। आयोग ने राज्य के 17 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द कर दिया है। निर्वाचन आयोग के अनुसार यह कार्रवाई जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत किया गया है। इस नियम के अनुसार, पंजीकरण के सभी समय दलों को नाम, पता और पदाधिकारियों की जानकारी देना अनिवार्य है।

चुनाव आयोग (ECI) के अनुसार ये सभी दल पिछले छह वर्षों से निष्क्रिय हैं और उनके दिए पते पर उनका कार्यालय भी नहीं है। निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, यदि कोई दल लगातार छह वर्षों तक चुनाव में हिस्सा नहीं लेता है, तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सकता है। इसको लेकर आयोग ने जून 2025 में पंजीकृत 345 की जाँच शुरू की थी, जिसमें पाया गया कि देश के 334 दल छह वर्षों से अधिक समय से निष्क्रिय हैं। इस दौरान इन दलों ने न तो चुनाव लड़ा और न ही अपने पते अपडेट किए हैं। चुनाव आयोग की इस जांच में बिहार के भी 17 दलों के कार्यालय या तो फर्जी पाए गए या दिए गए पते पर नहीं थे।

इन राजनीतिक दलों पर EC की कार्रवाई:

बिहार से संबंधित जिन 17 राजनीतिक दलों पर चुनाव आयोग ने कार्रवाई की है, उनमें पटना की भारतीय पिछड़ा पार्टी, भारतीय सूरज दल, भारतीय युवा पार्टी (डेमोक्रेटिक), बक्सर की भारतीय जनतंत्र सनातन दल, सारण की बिहार जनता पार्टी, गया की देसी किसान पार्टी, भभुआ (कैमूर) की गांधी प्रकाश पार्टी, बक्सर की हिमाद्री जनरक्षक समाजवादी पार्टी (जनसेवक), पटना की क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी, क्रांतिकारी विकास दल, लोक आवाज दल, लोकतांत्रिक समता दल, राष्ट्रीय जनता पार्टी शामिल हैं। (भारतीय) भगवानपुर (वैशाली), राष्ट्रवादी जन कांग्रेस, पटना, राष्ट्रीय सर्वोदय पार्टी, सर्वजन कल्याण डेमोक्रेटिक पार्टी और जमुई की व्यवसायी किसान अल्पसंख्यक मोर्चा।

पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए चुनाव आयोग की कार्रवाई:

भारतीय चुनाव आयोग (ECI) का कहना है कि यह कार्रवाई चुनावी व्यवस्था को स्वच्छ और पारदर्शी बनाने की नीति का हिस्सा है। राजीनीतिक दलों को कर छूट, मुफ़्त मतदाता सूची और चुनाव चिन्ह जैसे लाभ मिलते हैं। लेकिन दलों के निष्क्रिय रहने से धन शोधन और कर चोरी की संभावना रहती है। ऐसे निष्क्रिय दलों को चुनाव आयोग ने कारण बताओ नोटिस जारी कर सुनवाई का आखिरी मौका दिया था। लेकिन 334 दल जवाब देने में विफल रहे। जिसके बाद अब ये दल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29बी, 29सी और आयकर अधिनियम, 1961 के तहत मिलने वाले लाभों से वंचित हो जाएँगे।

 

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